12 मई 2020 - 14:52
रमज़ान का दस्तरख़ान, अल्लाह के मेहमान- 15

ईश्वरीय धर्म इस्लाम के बुनियादी लक्ष्यों में से एक, आस्था व ईमान के आधार पर लोगों के दिलों व विचारों के बीच रिश्ते व एकता स्थापित करना है।

ईश्वरीय धर्म इस्लाम के बुनियादी लक्ष्यों में से एक, आस्था व ईमान के आधार पर लोगों के दिलों व विचारों के बीच रिश्ते व एकता स्थापित करना है ताकि इसके माध्यम से इस्लामी समुदाय दुश्मन के मुक़ाबले में एक ठोस व अपराजेय रूप हासिल कर ले और अधिकतम शक्ति के साथ उनके षड्यंत्रों को विफल बनाने के साथ ही उच्च ईश्वरीय व मानवीय लक्ष्यों को व्यवहारिक बनाने का मार्ग समतल करे। इस प्रकार के विचार के साथ नमाज़े जुमा को, इस्लामी समाज के वैभवशाली आदर्श के रूप में इस्लाम की उपासना व राजनीति संबंधी संस्कृति में विशेष स्थान हासिल है। क़ुरआने मजीद की शिक्षाओं और पैग़म्बरे इस्लाम व उनके पवित्र परिजनों ने नमाज़े जुमा में भाग लेने पर बहुत अधिक बल दिया है। इस संबंध में क़ुरआने मजीद सूरए जुमा की नवीं आयत में कहता हैः हे ईमान वालो! जब भी तुम्हें नमाज़े जुमा के लिए पुकारा जाए तो ईश्वर की याद की ओर दौड़ पड़ो और हर प्रकार के (व्यापारिक) लेन-देन को छोड़ दो कि नमाज़े जुमा की स्थापना तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम (ईश्वर के निकट उसके महत्व व स्थान को) जानते हो।

 

इस आयत में सबसे पहला बिंदु यह है कि नमाज़े जुमा और ईश्वर पर ईमान के बीच एक संबंध है और जो लोग चेतनापूर्ण ईमान रखते हैं वे उसके लिए बुलाए जाने पर, ईश्वर के आदेश पर न केवल यह कि उसकी ओर बढ़ते हैं बल्कि दौड़ जाते हैं ताकि अपनी बंदगी को व्यवहारिक रूप से प्रदर्शित कर सकें क्योंकि वे नमाज़, को ईश्वर की याद का प्रतीक मानते हैं और ऐसी स्थिति में जब वे अपने पालनहार की उपासना के लिए तैयार हो रहे होते हैं, तो ईश्वर ही के आदेश पर हर प्रकार के लेन-देन और व्यापारिक गतिविधियों को छोड़ देते हैं ताकि ईश्वर की याद की ओर से निश्चेत न हो जाएं।

 इस आयत के अंत में एक और बिंदु अपनी ओर ध्यान खींचता है और वह यह वाक्य है कि "यह तुम्हारे लिए बेहतर है, अगर तुम चेतना के साथ कर्म करो।" क्योंकि आध्यात्मिक व्यापार की तुलना, जिसमें ईश्वरीय रंग है और जो समाप्त होने वाला नहीं है, निश्चित रूप से किसी भी स्थिति में भौतिक लेन-देन से नहीं की जा सकती। अलबत्ता यह उसी समय होगा जब इंसान, साधारण भौतिक दृष्टि के विपरीत, जिसमें लोक को परलोक पर प्राथमिकता दी जाए, पूरी चेतना और दूरदृष्टि के साथ काम करे। क़ुरआने मजीद दूरदृष्टि रखने वाले इस प्रकार के लोगों की सराहना करते हुए कहता हैः वे ऐसे मर्द हैं जिन्हें व्यापार और क्रय-विक्रय ईश्वर की याद, नमाज क़ायम करने और ज़कात देने से निश्चेत नहीं करता। वे उस दिन से डरते रहते है जिसमें हृदय और आँखें पलट जाएँगी। इस आयत के अंतिम भाग के आधार पर नमाज़े जुमा, प्रलय के दिन इंसान के स्थायी अंजाम में प्रभावी है।

इमाम जाफ़र सादिक़ अलैहिस्सलाम, पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के हवाले से कहते हैं कि जुमे का दिन, प्रलय में हिसाब- किताब का दिन है जिस दिन ईश्वर सभी इंसानों को जीवित करके एकत्रित करेगा। कोई भी ईमान वाला जब नमाज़े जुमा के लिए पैदल जाता है तो ईश्वर नमाज़ के बाद उसे प्रलय के भय को सरल बना देता है। यह बहुत बड़ा दिन है जिसमें ईमान वाली महिलाएं और पुरुष, ईश्वरीय दया व कृपा का पात्र बनते हैं। एक अन्य स्थान पर उन्होंने कहा है कि प्रलय में ईश्वर से लोगों की निकटता व दूरी, नमाज़े जुमा में उनकी सम्मिलिति के अनुरूप होगी।

 

नमाज़े जुमा के महत्व के लिए इतना ही कहना काफ़ी है कि ईश्वर ने इसे उन लोगों पर अनिवार्य किया है जिन्हें स्वीकार करने योग्य परेशानी नहीं है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने भी कहा है कि जो भी मेरी ज़िंदगी में और मेरी मौत के बाद से लेकर प्रलय तक, नमाज़े जुमा को हल्का समझ कर उसमें शामिल न हो, ईश्वर उसके जीवन को कभी भी बेहतर नहीं होने देगा। जान लो कि इस प्रकार के व्यक्ति के नमाज़, हज और दान दक्षिणा का भी कोई महत्व नहीं होगा सिवाय इसके कि वह तौबा करे कि ईश्वर उसकी तौबा को स्वीकार करेगा और दया की दृष्टि से उसे देखेगा।

नमाज़े जुमा के इमाम की एक ज़िम्मेदारी यह है कि वह वह नमाज़ से पहले दो ख़ुत्बे या भाषण दे। दोनों ख़ुत्बों में ईश्वर के गुणगान और पैग़म्बर व उनके परिजनों पर दुरुद व सलाम भेजने के बाद उसे लोगों को ईश्वर से डरने उसके आदेशों के पालन की सिफ़ारिश करनी चाहिए। इसी तरह उसे लोगों को मानवीय व नैतिक गुणों से सुसज्जित होने के लिए प्रेरित करना चाहिए। इसके बाद दुनिया व इस्लामी जगत की अहम घटनाओं की समीक्षा करनी चाहिए और अत्याचारी व साम्राज्यवादी शक्तियों की हक़ीक़त से लोगों को अगवत कराना चाहिए। इमामे जुमा को उन अत्याचारग्रस्त राष्ट्रों की आवाज़ दुनिया के कानों तक पहुंचाने की कोशिश करनी चाहिए जिनकी आवाज़ सुनने वाला और जिनकी मदद करने वाला कोई नहीं है।

             

नमाज़े शब, जैसा कि इसके नाम से ही स्पष्ट है रात में पढ़ी जानी वाली ग़ैर अनिवार्य नमाज़ है। इसे नाफ़िलए लैल भी कहा जाता है। शब या रात, ईश्वर के ज्ञान व तत्वदर्शिता की अहम निशानियों में से एक तो है ही साथ ही बड़ी अहम व निर्णायक घटनाएं भी रात में हुई हैं, जैसे क़ुरआने मजीद रात के समय नाज़िल हुआ है, पैग़म्बरे इस्लाम की मेराज भी रात ही में हुई थी और इसी तरह उन्होंने मक्के से मदीने पलायन भी रात ही के समय किया था। इससे रात की अहमियत का पता चलता है। जहां तक नमाज़े शब की बात है तो क़ुरआने मजीद की कई आयतों में इसका उल्लेख हुआ है। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम के परिजनों के कथनों से यह बात स्पष्ट होती है कि नमाज़े शब पैग़म्बर के लिए अनिवार्य है। इस बारे में क़ुरआने मजीद कहता हैः (हे पैग़म्बर) रात का कुछ भाग नाफ़िला पढ़ते हुए जाग कर बिताइये कि यह आपके लिए अतिरिक्त दायित्व है, निकट है कि आपका पालनहार आपको प्रशंसनीय स्थान तक पहुंचा दे।

इस आयत के अंतिम भाग से स्पष्ट होता है कि अगर इंसान चाहे कि ईश्वर के निकट उच्च व सराहनीय स्थान हासिल करे तो रात के अंधेरे में, जब सभी लोग अपने अपने बिस्तरों में सो रहे होते हैं, उठना होगा और अपने आपको महान ईश्वर की उपासना और उससे प्रार्थना के लिए तैयार करना होगा। पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम कहते हैं कि ईश्वर का संदेश लाने वाला फ़रिश्ता मुझे निरंतर रात को जाग कर उपासना करने की सिफ़ारिश करता था, यहां तक कि मुझे ऐसा लगने लगा कि मेरे समुदाय के सबसे अच्छे लोग वे हैं जो रात में नहीं सोएंगे। एक अन्य स्थान पर उन्होंने कहा हैः ईश्वर की दया हो उस इंसान पर जो आधी रात को उठे और अपने पालनहार की उपासना करे। इस तरह के बंदे के दिल में ईश्वर अपना प्रकाश डाल देता है और फ़रिश्तों से कहता है कि मेरे इस बंदे को देखो कि जो रात के अंधकार में जब बुरे लोग अपनी वासनाओं की पूर्ति में व्यस्त हैं और मेरी याद से निश्चेत लोग सो रहे हैं, यह मेरी उपासना के लिए जाग रहा है, गवाह रहना कि मैंने इसे क्षमा कर दिया है।

  

हज़रत अली अलैहिस्सलाम, जिन की रात की उपासनाएं बहुत ज़्यादा मशहूर हैं और जो पूरी पूरी रात अपने पालनहार से दुआ किया करते थे, नमाज़े शब पढ़ने वालों के बारे में कहते हैंः जब वे आधी रात को अपने बिस्तर से उठते हैं और अपने आपको संसार के रचयिता की उपासना व उससे प्रार्थना के लिए तैयार करते हैं तो धीरे धीरे क़ुरआने मजीद की आयतों की तिलावत करते हैं। वे क़ुरआनी आयतों को पढ़ कर, उनके गहरे अर्थों व उनके तात्पर्यों पर विचार करके अपने लिए एक प्रकाशमयी वातावरण बना लेते हैं। वे उसमें अपनी पीड़ाओं की दवा हासिल कर लेते हैं। वे क़ुरआन की ज़बान से जो कुछ सुनते हैं, मानो उसे अपने दिल की आंखों से देख रहे होते हैं। वे जब भी ईश्वरीय दया की कोई आयत देखते हैं तो आशावान हो जाते हैं और उनके दिल स्वर्ग के शौक़ से ओत-प्रोत हो जाते हैं और जब कभी वे ईश्वर के क्रोध व कोप की किसी आयत तक पहुंचते हैं तो उसकी सचेत करने वाली आवाज़ पर कान धरते हैं इस प्रकार से कि मानो वे नरक की ज्वालाओं के भड़कने की आवाज़ सुन रहे हों। इस प्रकार के भय व आशा के वातावरण में वे ईश्वर की महानता के सामने नतमस्तक हो जाते हैं और उसके समक्ष अपनी विनम्रता के चिन्ह के रूप में सज्दा करते हैं। वे हर प्रकार की बंदी बनाने वाली निर्भरता से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं। यही लोग, जो इस प्रकार रात में दुआ व उपासना करते हैं, दिन में हर समय विनम्रता, ज्ञान, पवित्रता व शिष्टाचार के साथ उपस्थित होते हैं और ज़िम्मेदारी का आभास करके समाज में प्रभावी उपस्थिति दर्ज कराते हैं।

यह जानना भी ज़रूरी है कि पैग़म्बरे इस्लाम सल्लल्लाहो अलैहे व आलेही व सल्लम ने नमाज़े शब की प्रभावी भूमिका और उसके महत्व को स्पष्ट करने के लिए हज़रत अली अलैहिस्सलाम से कहा थाः हे अली! नमाज़े शब अवश्य पढ़ो। यह वाक्य उन्होंने तीन-चार बार दोहराया था। दोस्तो आजके कार्यक्रम के अंत में हम ईश्वर से डरने और रात के समय जाग कर इबादत करने वालों के बारे में सूरए ज़ारियात की कुछ आयतों का अनुवाद पेश कर रहे हैं जिनमें क़ुरआने मजीद कहता हैः निश्चित रूप से उस दिन ईश्वर से डरने वाले स्वर्ग के बाग़ों व चश्मों में होंगे और जो कुछ उनका पालनहार उन्हें देगा उसे वे ख़ुशी ख़ुशी ले रहे होंगे (क्योंकि) इससे पहले वे (दुनिया में) सद्कर्मियों में थे। वे रातों को कम ही सोते थे और भोर के समय ईश्वर से क्षमा मांगते थे और उनके माल में मांगने वाले और वंचित का भी हक़ होता था।